शतृ प्रत्ययः
शतृप्रत्यय-युक्तं
शब्दरूपं लिखत।
यथा – पुल्लिंगें
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धातुः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
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पठ् |
पठन् |
पठन्तौ |
पठन्तः |
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चल् |
चलन् |
चलन्तौ |
चलन्तः |
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नम् |
नमन् |
नमन्तौ |
नमन्तः |
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ज्ञा |
जानन् |
जानन्तौ |
जानन्तः |
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वद् |
वदन् |
वदन्तौ |
वदन्तः |
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गम् |
गच्छन् |
गच्छन्तौ |
गच्छन्तः |
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दृश् |
पश्यन् |
पश्यन्तौ |
पश्यन्तः |
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दा |
यच्छन् |
यच्छन्तौ |
यच्छन्तः |
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पा |
पिबन् |
पिबन्तौ |
पिबन्तः |
स्त्रीलिङ्गरुपम्
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धातुः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
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पठ् |
पठन्ती |
पठन्त्यौ |
पठन्त्यः |
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चल् |
चलन्ती |
चलन्त्यौ |
चलन्त्यः |
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नम् |
नमन्ती |
नमन्त्यौ |
नमन्त्यः |
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ज्ञा |
जानन्ती |
जानन्त्यौ |
जानन्त्यः |
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वद् |
वदन्ती |
वदन्त्यौ |
वदन्त्यः |
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गम् |
गच्छन्ती |
गच्छन्त्यौ |
गच्छन्त्यः |
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दृश् |
पश्यन्ती |
पश्यन्त्यौ |
पश्यन्त्यः |
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दा |
यच्छन्ती |
यच्छन्त्यौ |
यच्छन्त्यः |
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पा |
पिबन्ती |
पिबन्त्यौ |
पिबन्त्यः |
नपुंसकलिङ्गरूपाणि
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धातुः |
एकवचनम् |
द्विवचनम् |
बहुवचनम् |
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पठ् |
पठत् |
पठती |
पठन्ति |
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चल् |
चलत् |
चलती |
चलन्ति |
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नम् |
नमत् |
नमती |
नमन्ति |
शतृप्रत्ययस्य प्रयोगः
हसन्तौ चित्रकारौ चित्रं पश्यतः। हस्
क्रीडन्ती बालिका पुस्तकमपि पठति। क्रीड्
पश्यन्त्यः अध्यापकाः आगच्छन्ति। दृश्
फलं पतत्
दूषितं भवति। पत्
पुनरावृत्तिः
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i rajasaBaayaaM main~णः ……………………saadrM p```Namaint. A rajaanama\
ii ……………………… pustkaina ku~? A Bavaतः
iii ……………………pirEamaoNa saflataM AvaSyaM Bavait. A राज्ञा
iv …………………AadrÁ sava-~ Bavait. d ivaduYaama\
v gaRho ……………………baalakaÁ ivavaadM kuva-int.sa विद्वासः
vi ikM %vaM jaanaaisa ………………… bahvaao gauNaaÁ . ba Bavait
vii ca%vaarÁ …………………t~ saint. A rajaaनः
viii …………………bahu साहसः Aist. द राज्ञि
ix …………………… ivaVaM pUज्यन्तेo na ih Qanama\. d rajasau
x अत्र द्वौ _________ आगतः। ब राजानौ
II धातुरूपाणां प्रयोगं कुरुत।
1. अद्य कक्षायां वाचनकौशलं अभवत्। (भू लङ्ग)
2. अहं परीक्षा-विषये निश्चिन्ता अस्मि। (अस् लट्)
3. अत्र तौ वेषभूषा निरीक्षकौ स्तः। (अस्
लट्)
4. त्वं बहूत्तमं अभियन्ता भव। (भू लोट्)
5. सर्वे उत्तमं कार्यं कुर्युः। (कृ विधिलिङ्)
6. मम मित्राणि अभिभावकान् सेवन्ते। (सेव् लट्)
7. सर्वे सुखिनः भवन्तु। (भू लोट्)
8. सा कार्यं पूर्णम् अकरोत्। (कृ लङ् )
9. वयं रुग्णान् सेवामहै। (सेव् लोट्)
10.
छात्राः
प्रेरणाप्रदं कार्यं कुर्वन्तु। (कृ लोट्)